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संस्कृत व्याकरण कारक एवं उपपद विभक्ति 17 अक्टूबर 2026

संस्कृत कारक एवं उपपद विभक्ति प्रकरणम्

लेखक: ज्ञान आर्काइव

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इस लेख में

1. 1. संस्कृत में कारकों की संख्या एवं विभक्ति-व्यवस्था 2. 2. विभक्ति के दो प्रकार: कारक विभक्ति एवं उपपद विभक्ति 3. 3. प्रथमा विभक्ति: कारक एवं उपपद नियम 4. 4. द्वितीया विभक्ति: कर्म कारक एवं समस्त उपपद नियम 5. 5. तृतीया विभक्ति: करण कारक एवं समस्त उपपद नियम 6. 6. चतुर्थी विभक्ति: सम्प्रदान कारक एवं समस्त उपपद नियम 7. 7. पञ्चमी विभक्ति: अपादान कारक एवं समस्त उपपद नियम 8. 8. षष्ठी विभक्ति: सम्बन्ध एवं समस्त उपपद नियम 9. 9. सप्तमी विभक्ति: अधिकरण कारक एवं समस्त उपपद नियम 10. 10. परीक्षा हेतु विशेष 'भ्रम-निवारण सारणी' (तुलनात्मक अध्ययन) 11. 11. विस्तृत अभ्यास के प्रश्न (वर्णनात्मक अभ्यास - उत्तर सहित) 12. बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 1: आसान (कक्षा 6–8) 13. बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 2: मध्यम (कक्षा 9–10, बोर्ड परीक्षा) 14. बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 3: कठिन (कक्षा 11–12, प्रतियोगी परीक्षाएँ) 15. उत्तर कुंजी (उत्तर और कारण) परीक्षा दें (टेस्ट दें)

'कारक एवं उपपद विभक्ति प्रकरणम्'

संस्कृत वाक्य-रचना में शब्दों का क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध जोड़ने वाले तत्त्व को 'कारक' कहते हैं। 'कारक' शब्द की व्युत्पत्ति 'कृ' धातु से 'ण्वुल्' (अक) प्रत्यय जुड़कर हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है— 'करने वाला' या 'क्रिया को निष्पन्न करने वाला'। महर्षि पाणिनि के व्याकरण में कारक की परिभाषा देते हुए कहा गया है— परीक्षा दें (टेस्ट दें)

"क्रियाजनकत्वं कारकत्वम्" अथवा "क्रियान्वयि कारकम्"

अर्थात् वाक्य में जिसका क्रिया के साथ सीधा अन्वय (सम्बन्ध) होता है अथवा जो क्रिया की सिद्धि में सहायक होता है, उसे कारक कहते हैं।

1. संस्कृत में कारकों की संख्या एवं विभक्ति-व्यवस्था

संस्कृत व्याकरण में विभक्तियाँ सात (7) होती हैं (प्रथमा से सप्तमी तक, तथा प्रथमा के अन्तर्गत ही सम्बोधन), परन्तु कारक केवल छह (6) ही माने जाते हैं। प्राचीन वैयाकरणों का प्रसिद्ध श्लोक है—

कर्त्ता कर्म च करणं च सम्प्रदानं तथैव च।

अपादानाधिकरणे इत्याहुः कारकाणि षट्॥

सात विभक्तियों और छह कारकों का तुलनात्मक विवरण:

क्र.सं.विभक्तिःकारक का नामकारक की परिभाषा (लक्षण)हिन्दी पहचान चिह्न
1.प्रथमाकर्ता कारकक्रिया को स्वतन्त्र रूप से करने वाला (स्वतन्त्रः कर्ता)ने (या चिह्न रहित)
2.द्वितीयाकर्म कारककर्ता अपनी क्रिया द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है (कर्तुरीप्सिततमं कर्म)को
3.तृतीयाकरण कारकक्रिया की सिद्धि में जो सबसे प्रमुख साधन हो (साधकतमं करणम्)से, के द्वारा
4.चतुर्थीसम्प्रदान कारककर्ता जिसके लिए कुछ कार्य करता है या जिसे दान देता हैके लिए, को
5.पञ्चमीअपादान कारकजहाँ से कोई वस्तु अलग (पृथक्) होती है (ध्रुवमपायेऽपादानम्)से (अलग होने में)
6.षष्ठीसम्बन्ध (अकारक)संज्ञा का संज्ञा से सम्बन्ध बताना (क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं)का, के, की, रा, रे, री
7.सप्तमीअधिकरण कारकक्रिया के होने का आधार या स्थान (आधारोऽधिकरणम्)में, पर
—सम्बोधनम्सम्बोधन (अकारक)किसी को पुकारने या सावधान करने के लिए (प्रथमा का ही रूप)हे!, अरे!, भोः!

महत्त्वपूर्ण प्रश्न: 'षष्ठी (सम्बन्ध)' और 'सम्बोधन' को कारक क्यों नहीं माना जाता?

एक उदाहरण से समझें— "दशरथस्य पुत्रः रामः बाणेन लङ्कायां रावणाय क्रुध्यन् रथात् रावणं हतवान्।"

यहाँ 'हतवान्' (मारा) क्रिया से जुड़े प्रश्न पूछें:

  • किसने मारा? ---- रामः (कर्ता कारक)
  • किसको मारा? ---- रावणम् (कर्म कारक)
  • किस साधन से मारा? ---- बाणेन (करण कारक)
  • किसके लिए/किस पर क्रोध करते हुए? ---- रावणाय (चतुर्थी — 'क्रुध्' के योग में)
  • कहाँ से (अलग होकर) मारा? ---- रथात् (अपादान कारक)
  • कहाँ (किस स्थान पर) मारा? ---- लङ्कायाम् (अधिकरण कारक)
    • किन्तु 'दशरथस्य' (दशरथ का) का 'हतवान्' (मारने की क्रिया) से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है! दशरथ ने रावण को नहीं मारा; 'दशरथस्य' का सम्बन्ध केवल 'पुत्रः रामः' (संज्ञा) से है। चूँकि सम्बन्ध और सम्बोधन का क्रिया से सीधा अन्वय नहीं होता, इसलिए इन्हें कारक नहीं माना जाता, यद्यपि इनमें क्रमशः षष्ठी और प्रथमा विभक्ति लगती है।

2. विभक्ति के दो प्रकार: कारक विभक्ति एवं उपपद विभक्ति

संस्कृत में शब्दों में लगने वाली विभक्तियाँ दो नियमों से निर्धारित होती हैं:

1. कारक विभक्ति: जब वाक्य में क्रिया के आधार पर या कारक-चिह्नों (ने, को, से, के लिए, में, पर) के आधार पर विभक्ति लगाई जाती है, तो उसे कारक विभक्ति कहते हैं। (जैसे— सः लेखन्या लिखति में लिखने के साधन 'लेखनी' में तृतीया विभक्ति)।

2. उपपद विभक्ति: जब वाक्य में किसी विशेष शब्द (अव्यय, संज्ञा, विशेषण या विशेष धातु) के पास होने के कारण कोई निश्चित विभक्ति लगाई जाती है, तो उसे 'उपपद विभक्ति' कहते हैं। ('उप' = समीप पठित, 'पद' = शब्द)।

◦ जैसे— सामान्य अर्थ में 'गाँव के चारों ओर' में 'के' चिह्न देखकर षष्ठी विभक्ति (ग्रामस्य) लगनी चाहिए थी, परन्तु 'परितः' (चारों ओर) उपपद होने के कारण यहाँ सदैव द्वितीया विभक्ति (ग्रामं परितः) ही लगती है!

विशेष व्याकरणिक नियम (उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी):

यदि किसी एक ही शब्द पर 'उपपद विभक्ति' और 'कारक विभक्ति' दोनों के नियम एक साथ लागू हो रहे हों, तो कारक विभक्ति अधिक बलवती (शक्तिशाली) होती है और वही लगाई जाती है। जैसे— 'नमः' अव्यय के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है (गुरवे नमः), परन्तु जब 'नम्' या 'नमस्कृ' क्रिया (धातु) का प्रयोग होता है, तो कर्म कारक बलीयान होने से द्वितीया विभक्ति ही लगती है (अहं गुरुं नमस्करोमि / गुरुं नमामि)।

3. प्रथमा विभक्ति: कारक एवं उपपद नियम

(क) मुख्य सूत्र एवं नियम

1. प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा: किसी शब्द का केवल अर्थ बताने (जैसे— कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम्), लिङ्ग बताने (तटः, तटी, तटम्), नाप-तौल बताने (द्रोणो व्रीहिः) और संख्या बताने (एकः, द्वौ, बहवः) में प्रथमा विभक्ति होती है।

2. स्वतन्त्रः कर्ता / कर्तरि प्रथमा: कर्तृवाच्य के वाक्य में क्रिया को करने वाले स्वतन्त्र कर्ता में सदैव प्रथमा विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: रामः वेदं पठति। बालिकाः उद्याने क्रीडन्ति।

3. कर्मणि प्रथमा (कर्मवाच्य में): कर्मवाच्य के वाक्य में कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: मया ग्रन्थः पठ्यते।

4. सम्बोधने च: किसी को सम्बोधित करने या पुकारने में प्रथमा विभक्ति ही प्रयुक्त होती है।

◦ उदाहरण: हे बालक! त्वं कुत्र गच्छसि? भोः छात्राः! सावधानाः भवत।

(ख) प्रथमा उपपद विभक्ति

  • 'इति' और 'नाम' अव्यय शब्दों के योग में संज्ञा का परिचय देते समय प्रथमा विभक्ति होती है:

1. अयोध्यायां दशरथः इति नृपः आसीत्। (अयोध्या में दशरथ नामक राजा था।)

2. पुरा रन्तिदेवः नाम दयालुः भूपतिः अभवत्। (प्राचीन काल में रन्तिदेव नाम का दयालु राजा हुआ।)

4. द्वितीया विभक्ति: कर्म कारक एवं समस्त उपपद नियम

(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम

1. कर्तुरीप्सिततमं कर्म / कर्मणि द्वितीया: कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिस वस्तु को सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, उसकी 'कर्म' संज्ञा होती है और कर्म में द्वितीया विभक्ति लगती है।

◦ उदाहरण: भक्तः ईश्वरं भजति। छात्रः विद्यालयं गच्छति। सः जलं पिबति।

2. अधिशीङ्स्थासां कर्म (अति महत्त्वपूर्ण): यदि शी (सोना), स्था (ठहरना/बैठना) और आस् (बैठना) धातुओं से पहले 'अधि' उपसर्ग जुड़ जाए (अधिशेते, अधितिष्ठति, अध्यास्ते), तो इनके आधार में सप्तमी न होकर द्वितीया विभक्ति होती है!

◦ उदाहरण: विष्णुः वैकुण्ठम् अधिशेते। (विष्णु वैकुण्ठ में सोते हैं।)

◦ उदाहरण: नृपः सिंहासनम् अधितिष्ठति / अध्यास्ते। (राजा सिंहासन पर बैठता है।)

3. उपान्वध्याङ्वसः: यदि 'वस्' (रहना) धातु से पहले उप, अनु, अधि, या आङ् (आ) उपसर्ग लग जाए (उपवसति, अनुवसति, अधिवसति, आवसति), तो रहने के स्थान (आधार) में सप्तमी के स्थान पर द्वितीया विभक्ति होती है!

◦ उदाहरण: सज्जनः ग्रामम् अधिवसति। (सज्जन गाँव में रहता है। — यदि उपसर्ग न हो तो: ग्रामे वसति)।

4. कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे: जब कोई कार्य लगातार कुछ समय तक या कुछ दूरी तक बिना रुके चलता रहे, तो उस समयवाची (काल) और दूरीवाची (अध्वन्) शब्द में द्वितीया विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: सः मासम् व्याकरणं पठति। (वह महीने भर लगातार व्याकरण पढ़ता है।)

◦ उदाहरण: नदी क्रोशं कुटिला अस्ति। (नदी एक कोस तक टेढ़ी है।)

5. अकथितं च (16 द्विकर्मक धातुएँ): संस्कृत में 16 धातुएँ द्विकर्मक होती हैं जिनमें दो कर्मों में द्वितीया विभक्ति लगती है—

• दुह् (दुहना) — गोपालः गां दुग्धं दोग्धि। (ग्वाला गाय से दूध दुहता है।)

• याच् (माँगना) — भिक्षुकः नृपं धनं याचते। (भिखारी राजा से धन माँगता है।)

• पच् (पकाना) — पाचकः तण्डुलान् ओदनं पचति। (रसोइया चावलों से भात पकाता है।)

• दण्ड् (दण्ड देना) — नृपः चौरं शतं दण्डयति। (राजा चोर पर सौ मुद्राओं का दण्ड लगाता है।)

• रुध् (रोकना) — गोपालः व्रजं गां रुणद्धि। (ग्वाला बाड़े में गाय को रोकता है।)

• प्रच्छ् (पूछना) — शिष्यः गुरुं प्रश्नं पृच्छति। (शिष्य गुरु से प्रश्न पूछता है।)

• चि (चुनना) — मालाकारः वृक्षं पुष्पाणि अवचिनोति। (माली वृक्ष से फूल चुनता है।)

• ब्रू (बोलना) — गुरुः शिष्यं धर्मं ब्रूते। (गुरु शिष्य को धर्म बताता है।)

• शास् (उपदेश देना) — आचार्यः छात्रं सत्यं शास्ति। (आचार्य छात्र को सत्य का उपदेश देता है।)

• जि (जीतना) — नृपः शत्रुं राज्यं जयति। (राजा शत्रु से राज्य जीतता है।)

• मथ् (मथना) — माता दधि नवनीतं मथ्नाति। (माता दही से मक्खन मथती है।)

• मुष् (चुराना) — चौरः धनिकं धनं मुष्णाति। (चोर धनी से धन चुराता है।)

• नी (ले जाना) — कृषकः ग्रामम् अजाम् नयति। (किसान गाँव में बकरी ले जाता है।)

• हृ (हरण करना) — चौरः कृपणं धनं हरति। (चोर कंजूस से धन हरता है।)

• कृष् (खींचना) — कृषकः क्षेत्रं जलं कर्षति। (किसान खेत में जल खींचता है।)

• वह् (ढोना) — श्रमिकः ग्रामं भारं वहति। (मजदूर गाँव में बोझ ढोता है।)

(ख) द्वितीया उपपद विभक्ति (समस्त शब्द एवं उदाहरण)

(सूत्र: अभितःपरितःसमयानिकषाहाप्रतियोगेऽपि तथा उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु)

वाक्य में निम्नलिखित शब्दों (उपपदों) के आने पर सम्बन्धित संज्ञा या सर्वनाम पद में सदैव द्वितीया विभक्ति लगती है:

क्र.सं.उपपद शब्दःहिन्दी अर्थवाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (द्वितीया विभक्ति में)
1.उभयतःदोनों ओरराजमार्गम् उभयतः वृक्षाः सन्ति। (सड़क के दोनों ओर पेड़ हैं।)
नदीम् उभयतः हरिताः क्षेत्राः सन्ति। (नदी के दोनों ओर हरे खेत हैं।)
2.अभितःदोनों ओर / सामनेआश्रमम् अभितः गावः चरन्ति। (आश्रम के दोनों ओर गायें चरती हैं।)
3.परितःचारों ओरग्रामं परितः वनानि सन्ति। (गाँव के चारों ओर वन हैं।)
विद्यालयं परितः प्राचीरम् अस्ति। (विद्यालय के चारों ओर चारदीवारी है।)
4.सर्वतःसब ओरदेवालयं सर्वतः भक्ताः तिष्ठन्ति। (मन्दिर के सब ओर भक्त खड़े हैं।)
पृथिवीं सर्वतः वायुः अस्ति। (पृथ्वी के सब ओर हवा है।)
5.समया / निकषासमीप / पासनगरं समया / निकषा नदी वहति। (नगर के समीप नदी बहती है।)
लङ्कां निकषा समुद्रः अस्ति। (लङ्का के पास समुद्र है।)
6.प्रतिकी ओर / के प्रतिछात्रः विद्यालयं प्रति गच्छति। (छात्र विद्यालय की ओर जाता है।)
दीनं जनं प्रति दयाम् कुरु। (दीन व्यक्ति के प्रति दया करो।)
7.अनुपीछे / के अनुसाररामम् अनु लक्ष्मणः वनम् अगच्छत्। (राम के पीछे लक्ष्मण वन गया।)
8.धिक्धिक्कार है!धिक् असत्यवादिनम्! (झूठ बोलने वाले को धिक्कार है!)
धिक् देशद्रोहिणम्! (देशद्रोही को धिक्कार है!)
9.हाहाय! (दुःख सूचक)हा दुर्जनम्! हा कृष्णाभक्तम्! (हाय दुर्जन! हाय कृष्ण के अभक्त!)
10.विनाके बिनापरिश्रमं विना सफलता न मिलति। (परिश्रम के बिना सफलता नहीं मिलती।)
ज्ञानं विना जीवनं व्यर्थम्। (नोट: 'विना' में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी तीनों लगती हैं)
11.अन्तरादो के बीच मेंत्वां मां च अन्तरा हरिः अस्ति। (तुम्हारे और मेरे बीच में हरि हैं।)
रामं श्यामं च अन्तरा मोहनः उपविशति।
12.अन्तरेणके बिना / के विषय मेंधर्मम् अन्तरेण सुखं नास्ति। (धर्म के बिना सुख नहीं है।)
13.उपरि-उपरिठीक ऊपर (द्विरुक्ति)लोकम् उपरि-उपरि सूर्यः तपति। (केवल एक 'उपरि' हो तो षष्ठी लगती है!)
14.अधोऽधः / अध्यधिठीक नीचे / ठीक अन्दरभूमिम् अधोऽधः जलम् अस्ति। संसारम् अध्यधि ईश्वरः अस्ति।

5. तृतीया विभक्ति: करण कारक एवं समस्त उपपद नियम

(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम

1. साधकतमं करणम् / कर्तृकरणयोस्तृतीया: क्रिया की सिद्धि में जो सबसे अधिक सहायक साधन होता है, उसे 'करण कारक' कहते हैं और उसमें तृतीया विभक्ति होती है। इसके अतिरिक्त कर्मवाच्य और भाववाच्य के कर्ता (अनुक्त कर्ता) में भी तृतीया विभक्ति लगती है।

◦ उदाहरण (करण): वयं नेत्राभ्यां पश्यामः। बालकः कन्दुकेन क्रीडति। सः द्विचक्रिकया गच्छति।

◦ उदाहरण (कर्मवाच्य का कर्ता): रामेण बाणेन बाली हतः। बालिकया गीतं गीयते।

2. अपवर्गे तृतीया: जब लगातार समय या दूरी चलने के बाद कार्य पूर्ण हो जाए (फल की प्राप्ति हो जाए), तो समय और दूरी में द्वितीया न होकर तृतीया विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: सः मासेन व्याकरणम् अपठत्। (उसने एक महीने में व्याकरण पढ़कर समाप्त कर लिया।)

3. हेतौ (कारण अर्थ में): जिस कारण या हेतु से कोई कार्य होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: विद्या विनयेन शोभते। परिश्रमेण कार्यं सिध्यति। सः हर्षेण नृत्यति।

(ख) तृतीया उपपद विभक्ति (समस्त शब्द, सूत्र एवं उदाहरण)

वाक्य में निम्नलिखित शब्दों या परिस्थितियों के होने पर सदैव तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है:

क्र.सं.नियम / उपपद शब्दःहिन्दी अर्थवाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (तृतीया विभक्ति में)
1.सह, साकम्, समम्, सार्धम्
(सूत्र: सहयुक्तेऽप्रधाने)
के साथपुत्रः पित्रा सह आपणं गच्छति। (पुत्र पिता के साथ बाजार जाता है।)
सीता रामेण साकं वनम् अगच्छत्।
अहं मित्रैः समं/सार्धं क्रीडामि।
2.येनाङ्गविकारः
(अंग-विकार नियम)
शरीर के जिस अंग में दोष/विकार होसः भिक्षुकः नेत्रेण काणः अस्ति। (वह भिखारी एक आँख से काना है। — दोनों आँखों से अंधा हो तो द्विवचन: नेत्राभ्याम् अन्धः)
वृद्धः कर्णाभ्यां बधिरः अस्ति। (बूढ़ा कानों से बहरा है।)
बालकः पादेन खञ्जः अस्ति। (लड़का पैर से लँगड़ा है।)
सः पृष्ठेन कुब्जः (पीठ से कुबड़ा) तथा शिरसा खल्वाटः (सिर से गंजा) अस्ति।
3.अलम्
(निषेध अर्थ में)
बस करो / मत करोअलं विवादेन! (विवाद मत करो!)
अलं कोलाहलेन! (शोर मत करो!)
अलं चिन्तया / हसितेन!
4.इत्थम्भूतलक्षणे
(पहचान सूचक चिह्न)
जिस चिह्न से किसी की पहचान होसः जटाभिः तापसः प्रतीयते। (वह जटाओं से तपस्वी प्रतीत होता है।)
सः पुस्तकेन छात्रः ज्ञायते। (वह पुस्तक से छात्र जान पड़ता है।)
5.किम् / कोऽर्थः / किं प्रयोजनम् / किं कार्यम्क्या लाभ / क्या प्रयोजनमूर्खेण पुत्रेण किम्? (मूर्ख पुत्र से क्या लाभ?)
अनीत्या अर्जितेन धनेन कोऽर्थः? (अनीति से कमाए धन से क्या लाभ?)
6.हीनः / रहितः / शून्यःसे रहित / बिनाविद्यया हीनः नरः पशुतुल्यः भवति। (विद्या से हीन मनुष्य पशु समान है।)
ज्ञानेन रहितः जनः आदरं न लभते।
7.विनाके बिनाजलेन विना मीनाः न जीवन्ति। (जल के बिना मछलियाँ जीवित नहीं रहतीं।)
उद्यमेन विना कार्याणि न सिध्यन्ति।
8.सदृशः / समः / तुल्यःके समान / बराबररामेण सदृशः (या रामस्य सदृशः) नृपः नास्ति।
मात्रा समं (माता के समान) किमपि तीर्थं नास्ति।
9.प्रकृत्यादिभ्यः (स्वभाव/नाम/जाति)स्वभाव से, नाम से, सुख से आदिसः प्रकृत्या / स्वभावेन साधुः अस्ति। (वह स्वभाव से सज्जन है।)
सः नाम्ना गोपालः, जात्या ब्राह्मणः च अस्ति। सः सुखेन जीवति।

6. चतुर्थी विभक्ति: सम्प्रदान कारक एवं समस्त उपपद नियम

(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम

1. कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् / चतुर्थी सम्प्रदाने: कर्ता अपने दान आदि कर्म द्वारा जिसे सन्तुष्ट करना चाहता है (जिसे कोई वस्तु सदा के लिए दी जाती है) या जिसके लिए कोई कार्य किया जाता है, उसकी 'सम्प्रदान' संज्ञा होती है और उसमें चतुर्थी विभक्ति लगती है।

◦ उदाहरण: नृपः निर्धनाय वस्त्रं यच्छति। (राजा निर्धन को वस्त्र देता है।)

◦ उदाहरण: मेघाः परोपकाराय जलम् वर्षन्ति। (बादल परोपकार के लिए जल बरसाते हैं।)

2. तादर्थ्ये चतुर्थी वाच्या (प्रयोजन या तुमर्थ में): जिस उद्देश्य या प्रयोजन के लिए कोई कार्य किया जाता है (अर्थात् जहाँ 'तुमुन्' प्रत्यय का अर्थ छिपा हो, जैसे— पढ़ने के लिए = पठितुम् = पठनाय), वहाँ चतुर्थी विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: छात्राः अध्ययनाय (पठितुम्) विद्यालयं गच्छन्ति।

◦ उदाहरण: माता स्नानाय (स्नातुम्) नदीं गच्छति। भक्तः मुक्तये हरिं भजति।

(ख) चतुर्थी उपपद विभक्ति (समस्त शब्द, धातुएँ एवं उदाहरण)

वाक्य में निम्नलिखित अव्यय शब्दों या धातुओं का प्रयोग होने पर सम्बन्धित पद में सदैव चतुर्थी विभक्ति लगती है:

क्र.सं.उपपद शब्द / धातुःहिन्दी अर्थवाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (चतुर्थी विभक्ति में)
1.नमः (सूत्र: नमःस्वस्ति...)नमस्कार होगणेशाय नमः। गुरवे नमः। सरस्वत्यै नमः। मातृभ्यः नमः।
(सावधानी: यदि 'नम्/प्रणम्' धातु हो, तो द्वितीया लगती है— सः गुरुं नमति)
2.स्वस्तिकल्याण होप्रजाभ्यः स्वस्ति।
छात्रेभ्यः स्वस्ति।
सर्वेभ्यः स्वस्ति।
3.स्वाहादेवताओं को आहुतिअग्नये स्वाहा।
इन्द्राय स्वाहा।
सूर्याय स्वाहा।
4.स्वधापितरों को तर्पणपितृभ्यः स्वधा।
5.वषट्देव-हवि समर्पणइन्द्राय वषट्।
पूष्णे वषट्।
6.अलम्
(पर्याप्त/समर्थ अर्थ में)
के लिए पर्याप्त / समर्थभीमः दुर्योधनाय अलम्।
(भीम दुर्योधन के लिए पर्याप्त है।)
रामः रावणाय अलम्।
मल्लः मल्लाय अलम्।
7.रुच् (रोचते) / स्वद् (रुच्यर्थानां प्रीयमाणः)अच्छा लगना (जिसे अच्छा लगे)बालकाय मोदकं रोचते।
(बालक को लड्डू अच्छा लगता है।)
मह्यं संस्कृतं रोचते।
(मुझे संस्कृत अच्छी लगती है।)
हरये भक्तिः रोचते।
8.क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्य्, असूय् (क्रुधद्रुहेर्ष्या...)क्रोध, द्रोह, ईर्ष्या, निन्दा करना (जिस पर क्रोध किया जाए)स्वामी सेवकाय क्रुध्यति।
(स्वामी नौकर पर क्रोध करता है।)
दुर्जनः सज्जनाय द्रुह्यति / ईर्ष्यति / असूयति।
(अपवाद: यदि क्रुध्/द्रुह् में उपसर्ग हो जैसे 'अभिक्रुध्यति', तो द्वितीया होती है)
9.दा (यच्छति / ददाति)देना (जिसे दिया जाए)धनिकः याचकाय धनं ददाति।
माता शिशवे दुग्धं यच्छति।
10.कथ्, निवेद्, उपदिश्कहना, निवेदन, उपदेश देनाशिष्यः गुरवे सत्यं कथयति / निवेदयति।
गुरुः शिष्येभ्यः धर्मम् उपदिशति।
11.स्पृह् (स्पृहयति) (स्पृहेरीप्सितः)इच्छा करना / चाहनाबालिका पुष्पेभ्यः स्पृहयति।
(लड़की फूलों की इच्छा करती है।)
सज्जनः ज्ञानाय स्पृहयति।
12.प्रति + श्रु / आ + श्रुवचन देना (प्रतिज्ञा करना)रामः विभीषणाय राज्यं प्रतिशृणोति।
(राम विभीषण को राज्य का वचन देते हैं।)

7. पञ्चमी विभक्ति: अपादान कारक एवं समस्त उपपद नियम

(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम

1. ध्रुवमपायेऽपादानम् / अपादाने पञ्चमी: 'अपाय' का अर्थ है विश्लेषण या अलग होना। जब कोई वस्तु किसी स्थिर (ध्रुव) स्थान से अलग होती है, तो उस स्थिर अवधिभूत कारक को 'अपादान' कहते हैं और उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: वृक्षात् पत्राणि पतन्ति। (वृक्ष से पत्ते गिरते हैं।)

◦ उदाहरण: आकाशात् जलं पतति। अश्वात् सैनिकः अपतत्। छात्रः विद्यालयात् गृहम् आगच्छति।

(ख) पञ्चमी उपपद विभक्ति (समस्त शब्द, धातुएँ, सूत्र एवं उदाहरण)

वाक्य में निम्नलिखित धातुओं या अव्यय पदों का प्रयोग होने पर सदैव पञ्चमी विभक्ति लगती है:

क्र.सं.नियम / उपपद / धातुःहिन्दी अर्थवाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (पञ्चमी विभक्ति में)
1.भी (बिभेति) एवं
त्रै / रक्ष्
(भीत्रार्थानां भयहेतुः)
डरना एवं रक्षा करना
(जिससे डरा/बचाया जाए)
बालकः सिंहात् / सर्पात् बिभेति। (बालक शेर/साँप से डरता है।)
सज्जनः पापात् बिभेति।
सैनिकः शत्रोः (या शत्रुभ्यः) देशं रक्षति / त्रायते।
2.बहिःके बाहरग्रामात् बहिः उद्यानम् अस्ति।
(गाँव के बाहर बगीचा है।)
कक्षायाः बहिः मा भ्रम।
(कक्षा के बाहर मत घूमो।)
3.प्र + भू (प्रभवति) /
उद् + गम् (भुवः प्रभवः)
उत्पन्न होना / निकलना
(उद्गम स्थान में)
गङ्गा हिमालयात् प्रभवति / निर्गच्छति।
(गङ्गा हिमालय से निकलती है।)
4.जन् (जायते) (जनिकर्तुः प्रकृतिः)जन्म लेना / पैदा होना
(मूल कारण में)
क्रोधात् सम्मोहः भवति, कामात् क्रोधः अभिजायते।
बीजात् अङ्कुरः जायते। (बीज से अंकुर उत्पन्न होता है।)
5.आख्यातोपयोगे
(नियमपूर्वक पढ़ना)
जिससे नियमपूर्वक विद्या सीखी जाएछात्राः उपाध्यायात् / गुरोः / आचार्यात् संस्कृतं पठन्ति / अधीयते।
6.प्रभृति / आरभ्यसे लेकरसः बाल्यात् प्रभृति / आरभ्य अत्र वसति।
(वह बचपन से लेकर यहाँ रहता है।)
7.पूर्वम् / प्राक्से पहलेभोजनात् पूर्वं हस्तौ प्रक्षालय।
(भोजन से पहले हाथ धोओ।)
ग्रामात् प्राक् नदी वहति।
8.परम् / अनन्तरम् / पश्चात् / ऊर्ध्वम्के बादपठनात् अनन्तरं (परं) सः क्रीडति।
(पढ़ने के बाद वह खेलता है।)
चैत्रात् परं वैशाखः आगच्छति।
9.ऋते / विनाके बिनाज्ञानात् ऋते (विना) मुक्तिः न भवति।
परिश्रमात् ऋते विद्या न लभ्यते।
10.पृथक् / नानासे अलगरामात् पृथक् सीता न अवसत्।
(राम से अलग सीता नहीं रहीं।)
11.प्रमाद्, विरम्, जुगुप्स्आलस्य, रुकना, घृणा करनासः धर्मात् / स्वाध्यायात् न प्रमाद्यति।
पापात् जुगुप्सते / विरमति।
12.दो में तुलना (तरप् प्रत्यय) (पञ्चमी विभक्ति)से श्रेष्ठ / से बढ़करधनात् विद्या श्रेष्ठतरा अस्ति।
रामात् श्यामः चतुरतरः अस्ति।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात् अपि गरीयसी।

8. षष्ठी विभक्ति: सम्बन्ध एवं समस्त उपपद नियम

(क) मुख्य सूत्र एवं नियम

1. षष्ठी शेषे: कारक और प्रातिपदिकार्थ से भिन्न जो 'शेष' है— अर्थात् एक संज्ञा/सर्वनाम का दूसरे संज्ञा पद से स्वामित्व, जन्य-जनक, अङ्ग-अङ्गी आदि सम्बन्ध बताने के लिए षष्ठी विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: इदं रामस्य पुस्तकम् अस्ति। वृक्षस्य शाखाः हरिताः सन्ति। गङ्गायाः जलं पवित्रम् अस्ति।

2. षष्ठी हेतुप्रयोगे: जब वाक्य में 'हेतु' (कारण) शब्द का स्पष्ट प्रयोग किया जाए, तब कारण और 'हेतु' दोनों में षष्ठी विभक्ति होती है।

◦ उदाहरण: सः अन्नस्य हेतोः वसति। (वह अन्न के कारण रहता है।)

(ख) षष्ठी उपपद विभक्ति (समस्त दिशा, स्थान एवं काल सूचक शब्द)

वाक्य में निम्नलिखित अव्यय या शब्दों का प्रयोग होने पर सम्बन्धित पद में सदैव षष्ठी विभक्ति लगती है:

क्र.सं.उपपद शब्दःहिन्दी अर्थवाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (षष्ठी विभक्ति में)
1.उपरिके ऊपरवृक्षस्य उपरि वानराः कूर्दन्ति।
(वृक्ष के ऊपर बन्दर कूद रहे हैं।)
भवनस्य उपरि ध्वजः राजते।
2.अधः / नीचैःके नीचेवृक्षस्य अधः पथिकाः विश्राम्यन्ति।
(वृक्ष के नीचे यात्री विश्राम करते हैं।)
भूमेः अधः खनिजपदार्थाः सन्ति।
3.पुरतः / अग्रे / समक्षम्के सामने / आगेविद्यालयस्य पुरतः क्रीडाक्षेत्रम् अस्ति।
(विद्यालय के सामने खेल का मैदान है।)
गुरोः समक्षम् / अग्रे सत्यं वद।
4.पृष्ठतः / पश्चात्के पीछेगृहस्य पृष्ठतः सुन्दरं उद्यानम् अस्ति।
(घर के पीछे सुन्दर बगीचा है।)
रक्षकस्य पृष्ठतः चोरः धावति।
5.वामतःके बाईं ओरदेवालयस्य वामतः धर्मशाला अस्ति।
(मन्दिर के बाईं ओर धर्मशाला है।)
6.दक्षिणतःके दाईं ओरराजमार्गस्य दक्षिणतः आपणः अस्ति।
(सड़क के दाईं ओर दुकान है।)
7.अन्तः / मध्येके अन्दर / बीच मेंकूपस्य अन्तः शीतलं जलम् अस्ति।
(कुएँ के अन्दर ठण्डा पानी है।)
ग्रामस्य मध्ये सरोवरः अस्ति।
8.समीपे / निकटे / पार्श्वेके पास / निकटनद्याः समीपे / तीरे आश्रमः अस्ति।
(ध्यान दें: 'निकषा/समया' में द्वितीया होती है, पर 'समीपे/निकटे' में षष्ठी!)
9.कृते / अर्थेके लिएमाता बालकस्य कृते भोजनं पचति।
(माता बालक के लिए भोजन पकाती है।)
10.तुल्यः / सदृशः / समःके समान
(तृतीया व षष्ठी दोनों)
कर्णस्य (या कर्णेन) तुल्यः दानी कोऽपि नास्ति।
11.अधीगर्थदयेशां कर्मणिस्मृ (दुःख से याद करना),
दय् (दया),
ईश् (स्वामी)
शिशुः मातुः स्मरति। (बच्चा माँ को याद करता है।)
सज्जनः दीनानां दयते।
12.निर्धारण (समूह में श्रेष्ठ)बहुतों में से एक की विशेषता बतानाकवीनां (या कविषु) कालिदासः श्रेष्ठः।
छात्राणां मोहनः पटुतमः अस्ति।

9. सप्तमी विभक्ति: अधिकरण कारक एवं समस्त उपपद नियम

(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम

1. आधारोऽधिकरणम् / सप्तम्यधिकरणे च: कर्ता और कर्म के द्वारा की जाने वाली क्रिया का जो आधार (स्थान या समय) होता है, उसकी 'अधिकरण' संज्ञा होती है और उसमें सप्तमी विभक्ति लगती है।

◦ आधार के तीन भेद एवं उदाहरण:

1. औपश्लेषिक आधार (संयोग मूलक):

• बालकः आसन्द्याम् (कुर्सी पर) उपविशति।

• वृक्षे खगाः वसन्ति।

2. वैषयिक आधार (विषय या रुचि मूलक):

• मम मोक्षे / संस्कृते इच्छा अस्ति। (मेरी मोक्ष/संस्कृत में इच्छा है।)

3. अभिव्यापक आधार (सब जगह व्याप्त):

• तिलेषु तैलम् अस्ति। (तिलों में तेल है।)

• दुग्धे घृतम् अस्ति।

• सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति।

2. यस्य च भावेन भावलक्षणम् (सति सप्तमी): जब एक कार्य के होने पर दूसरा कार्य हो, तो पहले हो चुके कार्य के कर्ता और क्रिया दोनों में सप्तमी विभक्ति लगती है।

◦ उदाहरण: सूर्ये उदिते कमलं विकसति। (सूर्य के उगने पर कमल खिलता है।)

◦ उदाहरण: रामे वनं गते दशरथः प्राणान् अत्यजत्। (राम के वन जाने पर दशरथ ने प्राण त्याग दिए।)

(ख) सप्तमी उपपद विभक्ति (समस्त शब्द, धातुएँ एवं उदाहरण)

वाक्य में निम्नलिखित विशेषण शब्दों या धातुओं का प्रयोग होने पर सदैव सप्तमी विभक्ति लगती है:

क्र.सं.उपपद शब्द / धातुःहिन्दी अर्थवाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (सप्तमी विभक्ति में)
1.निपुणः, कुशलः, प्रवीणः, दक्षः, चतुरः, पटुः, पण्डितःचतुर / होशियार / कुशलअर्जुनः धनुर्विद्यायाम् निपुणः आसीत्। (अर्जुन धनुर्विद्या में निपुण था।)
एषा बालिका नृत्ये / गायने कुशला / प्रवीणा अस्ति।
सः संस्कृतभाषणे दक्षः / पटुः अस्ति।
2.स्निह् (स्निह्यति)स्नेह / प्रेम करनामाता पुत्रे / सुतायाम् अतीव स्निह्यति। (माता पुत्र/पुत्री से बहुत स्नेह करती है।)
गुरुः शिष्येषु स्निह्यति।
3.विश्वस् (विश्वसिति)विश्वास करनाअहं स्वकीये मित्रे विश्वसिमि। (मैं अपने मित्र पर विश्वास करता हूँ।)
शठेषु (दुर्जनेषु) नैव विश्वसेत्।
4.संलग्नः, तत्परः, रतः, आसक्तः, व्यापृतःलगा हुआ / मग्नछात्राः अध्ययने / स्वकार्ये संलग्नाः / तत्पराः सन्ति।
मुनयः ईश्वरभक्तौ रताः भवन्ति।
5.श्रद्धा, आदरः, भक्तिः, अनुरागः, अभिलाषा, रुचिःश्रद्धा, आदर, प्रेम, रुचि होनामम पितरि महती श्रद्धा अस्ति। (मेरी पिता में बहुत श्रद्धा है।)
तस्य सङ्गीते / देशसेवायाम् अनुरागः / रुचिः अस्ति।
6.क्षिप् (क्षिपति) / मुच् (मुञ्चति)फेंकना / बाण छोड़ना (लक्ष्य में सप्तमी)व्याधः मृगे बाणं क्षिपति / मुञ्चति। (शिकारी हिरण पर बाण चलाता है।)
7.यतश्च निर्धारणम् (तमप् प्रत्यय / श्रेष्ठ)समूह में सबसे श्रेष्ठ (सप्तमी बहुवचन)नदीषु गङ्गा पवित्रतमा अस्ति। (नदियों में गङ्गा सबसे पवित्र है।)
पर्वतेषु हिमालयः उच्चतमः। छात्रेषु रमेशः श्रेष्ठः अस्ति।

10. परीक्षा हेतु विशेष 'भ्रम-निवारण सारणी' (तुलनात्मक अध्ययन)

कक्षा परीक्षा में छात्र मिलते-जुलते अर्थ वाले शब्दों में अक्सर गलत विभक्ति लगा देते हैं। इस तालिका को ध्यान से समझें:

क्र.भ्रम की स्थिति
(समानार्थी शब्द)
पहला नियम एवं उदाहरणदूसरा नियम एवं उदाहरण
1.प्रणाम करना: 'नमः' बनाम 'नम्' धातु'नमः' (अव्यय) = चतुर्थी विभक्ति
उदा: गुरवे नमः। जनकाय नमः।
'नम् / प्रणम्' (धातु) = द्वितीया विभक्ति
उदा: सः गुरुं नमति / प्रणमति।
2.'अलम्' अव्यय के दो अर्थनिषेध (मत करो) = तृतीया विभक्ति
उदा: अलं विवादेन। अलं कोलाहलेन।
पर्याप्त / समर्थ = चतुर्थी विभक्ति
उदा: रामः रावणाय अलम्।
3.दिशा/स्थान सूचक '-तः' वाले शब्दउभयतः, अभितः, परितः, सर्वतः = द्वितीया
उदा: विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति।
पुरतः, पृष्ठतः, वामतः, दक्षिणतः = षष्ठी
उदा: विद्यालयस्य पुरतः उद्यानम् अस्ति।
4.'पास / समीप' अर्थ वाले शब्दसमया, निकषा = द्वितीया विभक्ति
उदा: ग्रामं निकषा नदी वहति।
समीपे, निकटे, पार्श्वे = षष्ठी विभक्ति
उदा: ग्रामस्य समीपे नदी वहति।
5.'के लिए' अर्थ वाले शब्दचतुर्थी विभक्ति (सामान्य या दा धातु)
उदा: बालकाय दुग्धम् आनय।
'कृते' (उपपद) = षष्ठी विभक्ति
उदा: बालकस्य कृते दुग्धम् आनय।
6.'अन्दर' बनाम 'बाहर'अन्तः (अन्दर) = षष्ठी विभक्ति
उदा: गृहस्य अन्तः माता अस्ति।
बहिः (बाहर) = पञ्चमी विभक्ति
उदा: गृहात् बहिः बालकः क्रीडति।
7.'ऊपर / नीचे' (एक बार बनाम दो बार)उपरि, अधः (एक बार) = षष्ठी विभक्ति
उदा: वृक्षस्य उपरि खगाः, अधः पथिकः।
उपरि-उपरि, अधोऽधः (दो बार) = द्वितीया
उदा: लोकम् उपरि-उपरि सूर्यः अस्ति।
8.तुलना करना (तरप् बनाम तमप्)दो में तुलना (तरप्) = पञ्चमी एकवचन
उदा: रामात् श्यामः पटुतरः अस्ति।
बहुतों में श्रेष्ठ (तमप्) = सप्तमी/षष्ठी बहु.
उदा: छात्रेषु / छात्राणां श्यामः पटुतमः।
9.'विना' (बिना) का विशेष नियमद्वितीया, तृतीया और पञ्चमी तीनों शुद्ध हैं!
उदा: ज्ञानं विना / ज्ञानेन विना / ज्ञानात् विना।
'ऋते' (बिना) = केवल पञ्चमी विभक्ति!
उदा: ज्ञानात् ऋते सुखं न लभ्यते।

11. विस्तृत अभ्यास के प्रश्न (वर्णनात्मक अभ्यास - उत्तर सहित)

अभ्यासः 1: रेखाङ्कितपदेषु प्रयुक्तं विभक्तिं तत्कारणं च लिखत—

(रेखाङ्कित पदों में प्रयुक्त विभक्ति और उसका कारण लिखिए — सीबीएसई बोर्ड पैटर्न)

1. विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति।

2. बालकः कुक्कुरात् बिभेति।

3. पिता पुत्राय क्रुध्यति।

4. सीता रामेण सह वनम् अगच्छत्।

5. वृक्षस्य उपरि वानरः तिष्ठति।

6. सः बालकः कर्णेन बधिरः अस्ति।

7. अग्नये स्वाहा।

8. माता शिशौ स्निह्यति।

9. गृहात् बहिः उद्यानम् अस्ति।

10. कविषु कालिदासः श्रेष्ठः अस्ति।

उत्तराणि (अभ्यासः 1):

1. द्वितीया विभक्तिः — 'परितः' अव्यय के योग में (परितः योगे द्वितीया)।

2. पञ्चमी विभक्तिः — 'भी' (बिभेति) धातु के योग में (भीत्रार्थानां भयहेतुः / भी धातु योगे पञ्चमी)।

3. चतुर्थी विभक्तिः — 'क्रुध्' (क्रुध्यति) धातु के योग में (क्रुध् धातु योगे चतुर्थी)।

4. तृतीया विभक्तिः — 'सह' अव्यय के योग में (सह योगे तृतीया)।

5. षष्ठी विभक्तिः — 'उपरि' अव्यय के योग में (उपरि योगे षष्ठी)।

6. तृतीया विभक्तिः — अंग-विकार के योग में (येनाङ्गविकारः)।

7. चतुर्थी विभक्तिः — 'स्वाहा' अव्यय के योग में (स्वाहा योगे चतुर्थी)।

8. सप्तमी विभक्तिः — 'स्निह्' (स्निह्यति) धातु के योग में (स्निह् धातु योगे सप्तमी)।

9. पञ्चमी विभक्तिः — 'बहिः' अव्यय के योग में (बहिः योगे पञ्चमी)।

10. सप्तमी विभक्तिः — निर्धारण अर्थ में / 'श्रेष्ठः' के योग में (यतश्च निर्धारणम्)।

अभ्यासः 2: कोष्ठके प्रदत्तशब्देषु समुचितां विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत—

(कोष्ठक में दिए गए शब्दों में उचित विभक्ति लगाकर रिक्त स्थान भरिए)

1. .................... (गुरु) नमः।

2. अहं .................... (गुरु) नमामि।

3. अलं .................... (कोलाहल)! शान्तं तिष्ठत।

4. गङ्गा .................... (हिमालय) प्रभवति।

5. .................... (नदी) उभयतः हरिताः वृक्षाः सन्ति।

6. .................... (भोजन) पूर्वं हस्तौ प्रक्षालय।

7. मम मित्रं .................... (गणित) निपुणः अस्ति।

8. .................... (देवालय) पुरतः भक्ताः तिष्ठन्ति।

9. .................... (शिशु) मोदकं रोचते।

10. .................... (परिश्रम) विना विद्या न लभ्यते।

उत्तराणि (अभ्यासः 2):

1. गुरवे ('नमः' के योग में चतुर्थी एकवचन)।

2. गुरुम् ('नम्' धातु के योग में कर्म कारक द्वितीया एकवचन)।

3. कोलाहलेन (निषेधार्थक 'अलम्' के योग में तृतीया एकवचन)।

4. हिमालयात् ('प्रभवति' निकलने के योग में पञ्चमी एकवचन)।

5. नदीम् ('उभयतः' के योग में द्वितीया एकवचन)।

6. भोजनात् ('पूर्वम्' के योग में पञ्चमी एकवचन)।

7. गणिते ('निपुणः' के योग में सप्तमी एकवचन)।

8. देवालयस्य ('पुरतः' के योग में षष्ठी एकवचन)।

9. शिशवे ('रोचते' अच्छा लगने के योग में चतुर्थी एकवचन)।

10. परिश्रमं / परिश्रमेण / परिश्रमात् ('विना' के योग में द्वितीया, तृतीया या पञ्चमी तीनों में से कोई भी एक रूप शुद्ध है)।

अभ्यासः 3: अशुद्ध-रेखाङ्कितपदानि संशोध्य वाक्यानि पुनः लिखत—

1. पुत्री माता सह आपणं गच्छति।

2. ग्रामस्य परितः क्षेत्राणि सन्ति।

3. बालकः सिंहेन बिभेति।

4. पिता पुत्रे क्रुध्यति।

5. सः नेत्रात् काणः अस्ति।

उत्तराणि (अभ्यासः 3):

1. पुत्री माता सह आपणं गच्छति। ---- शुद्धम्: पुत्री मात्रा सह आपणं गच्छति। ('सह' योगे तृतीया)।

2. ग्रामस्य परितः क्षेत्राणि सन्ति। ---- शुद्धम्: ग्रामं परितः क्षेत्राणि सन्ति। ('परितः' योगे द्वितीया)।

3. बालकः सिंहेन बिभेति। ---- शुद्धम्: बालकः सिंहात् बिभेति। ('भी' योगे पञ्चमी)।

4. पिता पुत्रे क्रुध्यति। ---- शुद्धम्: पिता पुत्राय क्रुध्यति। ('क्रुध्' योगे चतुर्थी)।

5. सः नेत्रात् काणः अस्ति। ---- शुद्धम्: सः नेत्रेण काणः अस्ति। (अंगविकार में तृतीया)।

बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 1: आसान (कक्षा 6–8)

आसान स्तर के प्रश्न हिंदी में हैं — नियम और रूपों की सीधी पहचान।

1. संस्कृत में विभक्तियाँ कितनी होती हैं?
(क) पाँच
(ख) छह
(ग) सात
(घ) आठ

2. संस्कृत में कारक कितने माने गए हैं?
(क) सात
(ख) आठ
(ग) पाँच
(घ) छह

3. कर्तृवाच्य में कर्ता में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) द्वितीया
(ख) प्रथमा
(ग) षष्ठी
(घ) तृतीया

4. कर्म कारक में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) सप्तमी
(ख) तृतीया
(ग) द्वितीया
(घ) प्रथमा

5. करण कारक में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) पञ्चमी
(ख) तृतीया
(ग) चतुर्थी
(घ) द्वितीया

6. संप्रदान कारक में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) तृतीया
(ख) पञ्चमी
(ग) चतुर्थी
(घ) षष्ठी

7. अपादान कारक में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) तृतीया
(ख) सप्तमी
(ग) षष्ठी
(घ) पञ्चमी

8. संबंध में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) प्रथमा
(ख) षष्ठी
(ग) सप्तमी
(घ) चतुर्थी

9. अधिकरण कारक में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) पञ्चमी
(ख) षष्ठी
(ग) सप्तमी
(घ) द्वितीया

10. करण कारक का हिंदी चिह्न क्या है?
(क) को
(ख) में / पर
(ग) के लिए
(घ) से / के द्वारा

11. संप्रदान कारक का हिंदी चिह्न क्या है?
(क) ने
(ख) के लिए
(ग) से (अलग होना)
(घ) का / की / के

12. अपादान कारक का हिंदी चिह्न क्या है?
(क) में
(ख) के द्वारा
(ग) को
(घ) से (अलग होने के अर्थ में)

13. अधिकरण कारक का हिंदी चिह्न क्या है?
(क) को
(ख) का
(ग) में / पर
(घ) के लिए

14. ‘रामः पठति’ में ‘रामः’ किस विभक्ति में है?
(क) द्वितीया
(ख) षष्ठी
(ग) प्रथमा
(घ) सप्तमी

15. ‘सः विद्यालयं गच्छति’ में ‘विद्यालयं’ किस विभक्ति में है?
(क) प्रथमा
(ख) चतुर्थी
(ग) सप्तमी
(घ) द्वितीया

16. ‘सः लेखन्या लिखति’ में ‘लेखन्या’ किस विभक्ति में है?
(क) तृतीया
(ख) पञ्चमी
(ग) चतुर्थी
(घ) सप्तमी

17. ‘वृक्षात् पत्राणि पतन्ति’ में ‘वृक्षात्’ किस विभक्ति में है?
(क) पञ्चमी
(ख) सप्तमी
(ग) षष्ठी
(घ) तृतीया

18. ‘जले मत्स्याः वसन्ति’ में ‘जले’ किस विभक्ति में है?
(क) चतुर्थी
(ख) सप्तमी
(ग) प्रथमा
(घ) द्वितीया

19. ‘रामस्य पुस्तकम्’ में ‘रामस्य’ किस विभक्ति में है?
(क) तृतीया
(ख) षष्ठी
(ग) चतुर्थी
(घ) पञ्चमी

20. ‘नृपः ब्राह्मणाय धनं ददाति’ में ‘ब्राह्मणाय’ किस विभक्ति में है?
(क) सप्तमी
(ख) षष्ठी
(ग) द्वितीया
(घ) चतुर्थी

21. ‘सह’ (साथ) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) तृतीया
(ख) षष्ठी
(ग) चतुर्थी
(घ) द्वितीया

22. ‘नमः’ के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) द्वितीया
(ख) चतुर्थी
(ग) तृतीया
(घ) षष्ठी

23. ‘परितः’ (चारों ओर) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) पञ्चमी
(ख) षष्ठी
(ग) सप्तमी
(घ) द्वितीया

24. ‘उभयतः’ (दोनों ओर) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) तृतीया
(ख) द्वितीया
(ग) सप्तमी
(घ) षष्ठी

25. ‘प्रति’ (की ओर) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) षष्ठी
(ख) द्वितीया
(ग) चतुर्थी
(घ) पञ्चमी

26. ‘स्वस्ति’ (कल्याण हो) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) द्वितीया
(ख) षष्ठी
(ग) प्रथमा
(घ) चतुर्थी

27. ‘बहिः’ (बाहर) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) पञ्चमी
(ख) षष्ठी
(ग) द्वितीया
(घ) सप्तमी

28. ‘भी’ (डरना) धातु के योग में जिससे डर लगे, उसमें कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) पञ्चमी
(ख) तृतीया
(ग) चतुर्थी
(घ) द्वितीया

29. ‘रुच्’ (अच्छा लगना) धातु के योग में जिसे अच्छा लगे, उसमें कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) प्रथमा
(ख) षष्ठी
(ग) सप्तमी
(घ) चतुर्थी

30. ‘क्रुध्’ (क्रोध करना) धातु के योग में जिस पर क्रोध हो, उसमें कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) द्वितीया
(ख) चतुर्थी
(ग) षष्ठी
(घ) सप्तमी

31. ‘विना’ के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) केवल चतुर्थी
(ख) केवल षष्ठी
(ग) केवल सप्तमी
(घ) द्वितीया, तृतीया या पञ्चमी

32. निषेध के अर्थ में ‘अलम्’ के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) तृतीया
(ख) द्वितीया
(ग) चतुर्थी
(घ) षष्ठी

33. ‘साकम्’ / ‘सार्धम्’ (साथ) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) सप्तमी
(ख) षष्ठी
(ग) तृतीया
(घ) चतुर्थी

34. ‘अधः’ (नीचे) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) द्वितीया
(ख) सप्तमी
(ग) षष्ठी
(घ) पञ्चमी

35. ‘उपरि’ (ऊपर) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) सप्तमी
(ख) द्वितीया
(ग) षष्ठी
(घ) तृतीया

36. ‘पुरतः’ (सामने) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) चतुर्थी
(ख) पञ्चमी
(ग) षष्ठी
(घ) द्वितीया

37. संबोधन किस विभक्ति का ही एक रूप माना जाता है?
(क) प्रथमा
(ख) सप्तमी
(ग) षष्ठी
(घ) द्वितीया

38. क्रिया के आधार (स्थान) को कौन-सा कारक कहते हैं?
(क) करण
(ख) अपादान
(ग) संप्रदान
(घ) अधिकरण

39. ‘स्पृह्’ (चाहना) धातु के योग में जिसे चाहा जाए, उसमें कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) चतुर्थी
(ख) द्वितीया
(ग) षष्ठी
(घ) पञ्चमी

40. ‘अभितः’ (सब ओर) के योग में कौन-सी विभक्ति होती है?
(क) द्वितीया
(ख) सप्तमी
(ग) तृतीया
(घ) षष्ठी

इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।

बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 2: मध्यम (कक्षा 9–10, बोर्ड परीक्षा)

मध्यमस्तरीयाः प्रश्नाः संस्कृतभाषायाम् — बोर्ड-परीक्षायाः प्रारूपानुसारम्।

1. ‘रामेण सह सीता वनं गच्छति।’ — अत्र ‘रामेण’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) तृतीया
(ख) चतुर्थी
(ग) प्रथमा
(घ) षष्ठी

2. ‘ग्रामं परितः वृक्षाः सन्ति।’ — अत्र ‘ग्रामं’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) प्रथमा
(ख) सप्तमी
(ग) द्वितीया
(घ) षष्ठी

3. ‘गणेशाय नमः।’ — अत्र ‘गणेशाय’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) तृतीया
(ख) द्वितीया
(ग) चतुर्थी
(घ) षष्ठी

4. ‘बालकः सिंहात् बिभेति।’ — अत्र ‘सिंहात्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) षष्ठी
(ख) द्वितीया
(ग) पञ्चमी
(घ) तृतीया

5. ‘हरये रोचते भक्तिः।’ — अत्र ‘हरये’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) चतुर्थी
(ख) सप्तमी
(ग) प्रथमा
(घ) षष्ठी

6. ‘सः अक्ष्णा काणः अस्ति।’ — अत्र ‘अक्ष्णा’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) सप्तमी
(ख) पञ्चमी
(ग) षष्ठी
(घ) तृतीया

7. ‘विद्यालयात् बहिः क्रीडाक्षेत्रम् अस्ति।’ — अत्र ‘विद्यालयात्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) पञ्चमी
(ख) षष्ठी
(ग) तृतीया
(घ) सप्तमी

8. ‘वृक्षस्य उपरि खगाः सन्ति।’ — अत्र ‘वृक्षस्य’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) द्वितीया
(ख) षष्ठी
(ग) पञ्चमी
(घ) सप्तमी

9. ‘पिता पुत्राय क्रुध्यति।’ — अत्र ‘पुत्राय’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) चतुर्थी
(ख) द्वितीया
(ग) षष्ठी
(घ) सप्तमी

10. ‘अलं विवादेन।’ — अत्र ‘विवादेन’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) तृतीया
(ख) पञ्चमी
(ग) चतुर्थी
(घ) द्वितीया

11. ‘ज्ञानं विना जीवनं व्यर्थम्।’ — अत्र ‘ज्ञानं’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) षष्ठी
(ख) तृतीया
(ग) प्रथमा
(घ) द्वितीया

12. ‘गङ्गा हिमालयात् प्रभवति।’ — अत्र ‘हिमालयात्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) सप्तमी
(ख) षष्ठी
(ग) तृतीया
(घ) पञ्चमी

13. ‘छात्रः उपाध्यायात् अधीते।’ — अत्र ‘उपाध्यायात्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) चतुर्थी
(ख) पञ्चमी
(ग) तृतीया
(घ) षष्ठी

14. ‘मोक्षे इच्छा अस्ति।’ — अत्र ‘मोक्षे’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) पञ्चमी
(ख) प्रथमा
(ग) चतुर्थी
(घ) सप्तमी

15. ‘कृष्णः गोपेषु श्रेष्ठः।’ — अत्र ‘गोपेषु’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) प्रथमा
(ख) चतुर्थी
(ग) तृतीया
(घ) सप्तमी

16. ‘बालकः गृहं प्रति गच्छति।’ — अत्र ‘गृहं’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) षष्ठी
(ख) चतुर्थी
(ग) सप्तमी
(घ) द्वितीया

17. ‘स्वस्ति प्रजाभ्यः।’ — अत्र ‘प्रजाभ्यः’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) षष्ठी
(ख) पञ्चमी
(ग) प्रथमा
(घ) चतुर्थी

18. ‘मह्यं मोदकं रोचते।’ — अत्र ‘मह्यं’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) चतुर्थी
(ख) प्रथमा
(ग) द्वितीया
(घ) षष्ठी

19. ‘____ उभयतः वृक्षाः सन्ति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) नदीम्
(ख) नद्याः
(ग) नद्या
(घ) नद्याम्

20. ‘____ सह पुत्रः गच्छति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) पिता
(ख) पितरम्
(ग) पित्रा
(घ) पितुः

21. ‘____ नमः।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) शिवाय
(ख) शिवेन
(ग) शिवम्
(घ) शिवस्य

22. ‘बालकः ____ बिभेति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) सर्पेण
(ख) सर्पात्
(ग) सर्पम्
(घ) सर्पे

23. ‘____ परितः जनाः सन्ति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) मन्दिरे
(ख) मन्दिरात्
(ग) मन्दिरम्
(घ) मन्दिरस्य

24. ‘____ उपरि चटका अस्ति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) वृक्षाय
(ख) वृक्षस्य
(ग) वृक्षम्
(घ) वृक्षेण

25. ‘अहं ____ विना न गमिष्यामि।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) तव
(ख) त्वम्
(ग) त्वयि
(घ) त्वाम्

26. ‘____ लड्डुकं रोचते।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) बालकस्य
(ख) बालकाय
(ग) बालकम्
(घ) बालकः

27. ‘सः ____ काणः अस्ति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) नेत्रम्
(ख) नेत्रेण
(ग) नेत्रे
(घ) नेत्रस्य

28. ‘____ बहिः छात्राः क्रीडन्ति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) ग्रामात्
(ख) ग्रामम्
(ग) ग्रामेण
(घ) ग्रामे

29. ‘पिता ____ क्रुध्यति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) पुत्रेण
(ख) पुत्राय
(ग) पुत्रस्य
(घ) पुत्रम्

30. ‘अलं ____।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) कोलाहलम्
(ख) कोलाहलेन
(ग) कोलाहलः
(घ) कोलाहलस्य

31. ‘____ स्वस्ति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) प्रजानाम्
(ख) प्रजासु
(ग) प्रजाभ्यः
(घ) प्रजाः

32. ‘____ अधः जलम् अस्ति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) सेतुना
(ख) सेतौ
(ग) सेतोः
(घ) सेतुम्

33. ‘नृपः ____ धनं यच्छति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) निर्धनम्
(ख) निर्धनाय
(ग) निर्धनात्
(घ) निर्धनेन

34. ‘गङ्गा ____ प्रभवति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) हिमालयेन
(ख) हिमालये
(ग) हिमालयम्
(घ) हिमालयात्

35. ‘____ अभितः वनम् अस्ति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) नगरे
(ख) नगरस्य
(ग) नगरम्
(घ) नगरेण

36. ‘सा ____ सह विद्यालयं गच्छति।’ — उचितं पदं चिनुत।
(क) सख्या
(ख) सखीम्
(ग) सख्याः
(घ) सखी

37. ‘सह’ शब्दस्य योगे का विभक्तिः भवति?
(क) द्वितीया
(ख) षष्ठी
(ग) तृतीया
(घ) चतुर्थी

38. ‘नमः’ शब्दस्य योगे का विभक्तिः भवति?
(क) तृतीया
(ख) द्वितीया
(ग) सप्तमी
(घ) चतुर्थी

39. ‘भी’ धातोः योगे भयहेतौ का विभक्तिः भवति?
(क) तृतीया
(ख) पञ्चमी
(ग) षष्ठी
(घ) चतुर्थी

40. ‘उपरि’ शब्दस्य योगे का विभक्तिः भवति?
(क) सप्तमी
(ख) षष्ठी
(ग) द्वितीया
(घ) पञ्चमी

इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।

बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 3: कठिन (कक्षा 11–12, प्रतियोगी परीक्षाएँ)

कठिनस्तरीयाः प्रश्नाः संस्कृतभाषायाम् — सूत्र, पद-परिचय, असङ्गत-युग्म, कथन-कारण च।

1. ‘कर्तुरीप्सिततमं कर्म’ — अनेन सूत्रेण कस्य संज्ञा भवति?
(क) कर्मकारकस्य
(ख) करणकारकस्य
(ग) सम्प्रदानकारकस्य
(घ) अधिकरणकारकस्य

2. ‘साधकतमं करणम्’ — अनेन सूत्रेण कस्य संज्ञा भवति?
(क) कर्मकारकस्य
(ख) कर्तृकारकस्य
(ग) अपादानकारकस्य
(घ) करणकारकस्य

3. ‘ध्रुवमपायेऽपादानम्’ — अनेन सूत्रेण कस्य संज्ञा भवति?
(क) अधिकरणकारकस्य
(ख) अपादानकारकस्य
(ग) सम्प्रदानकारकस्य
(घ) करणकारकस्य

4. ‘आधारोऽधिकरणम्’ — अनेन सूत्रेण कस्य संज्ञा भवति?
(क) कर्मकारकस्य
(ख) अपादानकारकस्य
(ग) अधिकरणकारकस्य
(घ) करणकारकस्य

5. ‘कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्’ — अनेन सूत्रेण कस्य संज्ञा भवति?
(क) करणकारकस्य
(ख) कर्मकारकस्य
(ग) सम्प्रदानकारकस्य
(घ) अपादानकारकस्य

6. ‘स्वतन्त्रः कर्ता’ — अनेन सूत्रेण कस्य संज्ञा भवति?
(क) करणकारकस्य
(ख) कर्तृकारकस्य
(ग) कर्मकारकस्य
(घ) अधिकरणकारकस्य

7. ‘सहयुक्तेऽप्रधाने’ — अनेन सूत्रेण का विभक्तिः विधीयते?
(क) द्वितीया
(ख) षष्ठी
(ग) तृतीया
(घ) चतुर्थी

8. ‘नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च’ — अनेन सूत्रेण का विभक्तिः विधीयते?
(क) द्वितीया
(ख) तृतीया
(ग) षष्ठी
(घ) चतुर्थी

9. ‘भीत्रार्थानां भयहेतुः’ — अनेन सूत्रेण भयहेतोः का संज्ञा भवति?
(क) अपादानम्
(ख) अधिकरणम्
(ग) करणम्
(घ) सम्प्रदानम्

10. ‘रुच्यर्थानां प्रीयमाणः’ — अनेन सूत्रेण प्रीयमाणस्य का संज्ञा भवति?
(क) अपादानम्
(ख) करणम्
(ग) सम्प्रदानम्
(घ) कर्म

11. ‘येनाङ्गविकारः’ — अनेन सूत्रेण का विभक्तिः विधीयते?
(क) पञ्चमी
(ख) षष्ठी
(ग) सप्तमी
(घ) तृतीया

12. ‘अभितःपरितःसमयानिकषाहाप्रतियोगेऽपि’ — अनेन सूत्रेण का विभक्तिः विधीयते?
(क) तृतीया
(ख) द्वितीया
(ग) सप्तमी
(घ) षष्ठी

13. ‘क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः’ — अनेन सूत्रेण का संज्ञा भवति?
(क) अपादानम्
(ख) अधिकरणम्
(ग) सम्प्रदानम्
(घ) कर्म

14. ‘आख्यातोपयोगे’ — अनेन सूत्रेण अध्यापकस्य का संज्ञा भवति?
(क) करणम्
(ख) अपादानम्
(ग) कर्म
(घ) सम्प्रदानम्

15. ‘भुवः प्रभवः’ — अनेन सूत्रेण उद्गमस्थानस्य का संज्ञा भवति?
(क) अपादानम्
(ख) करणम्
(ग) अधिकरणम्
(घ) सम्प्रदानम्

16. ‘षष्ठी शेषे’ — अस्य सूत्रस्य अर्थः कः?
(क) करण में षष्ठी
(ख) अधिकरण में षष्ठी
(ग) कारक-भिन्न सम्बन्ध में षष्ठी
(घ) कर्म में षष्ठी

17. ‘यतश्च निर्धारणम्’ — अनेन सूत्रेण के विभक्ती विधीयेते?
(क) षष्ठी सप्तमी च
(ख) तृतीया चतुर्थी च
(ग) द्वितीया तृतीया च
(घ) पञ्चमी षष्ठी च

18. ‘अकथितं च’ — अनेन सूत्रेण द्विकर्मकधातूनां गौणकर्मणि का विभक्तिः?
(क) चतुर्थी
(ख) द्वितीया
(ग) षष्ठी
(घ) पञ्चमी

19. ‘गोपालः गां पयः दोग्धि।’ — अत्र ‘गाम्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) षष्ठी
(ख) तृतीया
(ग) पञ्चमी
(घ) द्वितीया

20. ‘सः ग्रामम् अधितिष्ठति।’ — अत्र ‘ग्रामम्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) सप्तमी
(ख) पञ्चमी
(ग) षष्ठी
(घ) द्वितीया

21. ‘हरिः वैकुण्ठम् अधिशेते।’ — अत्र ‘वैकुण्ठम्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) प्रथमा
(ख) द्वितीया
(ग) पञ्चमी
(घ) सप्तमी

22. ‘हरिः वैकुण्ठम् उपवसति।’ — अत्र ‘वैकुण्ठम्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) तृतीया
(ख) षष्ठी
(ग) सप्तमी
(घ) द्वितीया

23. ‘सः प्रकृत्या साधुः।’ — अत्र ‘प्रकृत्या’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) पञ्चमी
(ख) सप्तमी
(ग) प्रथमा
(घ) तृतीया

24. ‘सः अध्ययनेन वसति।’ — अत्र ‘अध्ययनेन’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) पञ्चमी
(ख) सप्तमी
(ग) तृतीया
(घ) चतुर्थी

25. ‘मुक्तये हरिं भजति।’ — अत्र ‘मुक्तये’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) सप्तमी
(ख) षष्ठी
(ग) द्वितीया
(घ) चतुर्थी

26. ‘बालकः पुष्पेभ्यः स्पृहयति।’ — अत्र ‘पुष्पेभ्यः’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) षष्ठी
(ख) पञ्चमी
(ग) द्वितीया
(घ) चतुर्थी

27. ‘देवदत्तः यज्ञदत्ताय शतं धारयति।’ — अत्र ‘यज्ञदत्ताय’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) षष्ठी
(ख) चतुर्थी
(ग) पञ्चमी
(घ) द्वितीया

28. ‘सज्जनः पापात् जुगुप्सते।’ — अत्र ‘पापात्’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) पञ्चमी
(ख) सप्तमी
(ग) षष्ठी
(घ) तृतीया

29. ‘कृषकः यवेभ्यः गां वारयति।’ — अत्र ‘यवेभ्यः’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) पञ्चमी
(ख) द्वितीया
(ग) षष्ठी
(घ) चतुर्थी

30. ‘बालकः मातुः निलीयते।’ — अत्र ‘मातुः’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) चतुर्थी
(ख) पञ्चमी
(ग) सप्तमी
(घ) षष्ठी

31. ‘ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते।’ — अत्र ‘ब्रह्मणः’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) प्रथमा
(ख) षष्ठी
(ग) पञ्चमी
(घ) द्वितीया

32. ‘रामे वनं गते दशरथः प्राणान् अत्यजत्।’ — अत्र ‘रामे’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) षष्ठी
(ख) सप्तमी
(ग) प्रथमा
(घ) तृतीया

33. ‘कृष्णः मातरि साधुः।’ — अत्र ‘मातरि’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) चतुर्थी
(ख) सप्तमी
(ग) तृतीया
(घ) षष्ठी

34. ‘माथुराः पाटलिपुत्रकेभ्यः आढ्यतराः।’ — अत्र ‘पाटलिपुत्रकेभ्यः’ इति पदे का विभक्तिः?
(क) पञ्चमी
(ख) सप्तमी
(ग) षष्ठी
(घ) चतुर्थी

35. असङ्गतं युग्मं चिनुत—
(क) नमः — चतुर्थी
(ख) सह — तृतीया
(ग) परितः — द्वितीया
(घ) उपरि — सप्तमी

36. असङ्गतं युग्मं चिनुत—
(क) स्वस्ति — चतुर्थी
(ख) बहिः — षष्ठी
(ग) अलम् (निषेधे) — तृतीया
(घ) विना — द्वितीया

37. कथनम् (A): ‘ग्रामम् अभितः वृक्षाः सन्ति’ इति वाक्ये ‘ग्रामम्’ इति द्वितीया शुद्धा।
कारणम् (R): ‘अभितः’ शब्दस्य योगे द्वितीया भवति।
(क) कथनम् (A) कारणम् (R) च उभे सत्ये, R च A-इत्यस्य सम्यक् व्याख्या अस्ति।
(ख) कथनम् (A) कारणम् (R) च उभे सत्ये, किन्तु R A-इत्यस्य सम्यक् व्याख्या नास्ति।
(ग) कथनम् (A) सत्यम्, कारणम् (R) असत्यम्।
(घ) कथनम् (A) असत्यम्, कारणम् (R) सत्यम्।

38. कथनम् (A): ‘बालकः व्याघ्रेण बिभेति’ इति वाक्यं शुद्धम्।
कारणम् (R): ‘भी’ धातोः योगे भयहेतौ पञ्चमी भवति।
(क) कथनम् (A) कारणम् (R) च उभे सत्ये, R च A-इत्यस्य सम्यक् व्याख्या अस्ति।
(ख) कथनम् (A) कारणम् (R) च उभे सत्ये, किन्तु R A-इत्यस्य सम्यक् व्याख्या नास्ति।
(ग) कथनम् (A) सत्यम्, कारणम् (R) असत्यम्।
(घ) कथनम् (A) असत्यम्, कारणम् (R) सत्यम्।

39. कथनम् (A): ‘मह्यं मोदकं रोचते’ इति वाक्यं शुद्धम्।
कारणम् (R): ‘रुच्’ धातोः योगे प्रीयमाणे षष्ठी भवति।
(क) कथनम् (A) कारणम् (R) च उभे सत्ये, R च A-इत्यस्य सम्यक् व्याख्या अस्ति।
(ख) कथनम् (A) कारणम् (R) च उभे सत्ये, किन्तु R A-इत्यस्य सम्यक् व्याख्या नास्ति।
(ग) कथनम् (A) सत्यम्, कारणम् (R) असत्यम्।
(घ) कथनम् (A) असत्यम्, कारणम् (R) सत्यम्।

40. कथनम् (A): ‘कृष्णः गोपेषु श्रेष्ठः’ इति वाक्यं शुद्धम्।
कारणम् (R): निर्धारणे षष्ठी सप्तमी च भवतः।
(क) कथनम् (A) कारणम् (R) च उभे सत्ये, R च A-इत्यस्य सम्यक् व्याख्या अस्ति।
(ख) कथनम् (A) कारणम् (R) च उभे सत्ये, किन्तु R A-इत्यस्य सम्यक् व्याख्या नास्ति।
(ग) कथनम् (A) सत्यम्, कारणम् (R) असत्यम्।
(घ) कथनम् (A) असत्यम्, कारणम् (R) सत्यम्।

इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।

उत्तर कुंजी (उत्तर और कारण)

स्तर 1: आसान (कक्षा 6–8)

1. (ग) — प्रथमा से सप्तमी तक सात; संबोधन प्रथमा का ही रूप माना जाता है।

2. (घ) — कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण; संबंध को कारक नहीं माना जाता।

3. (ख) — जैसे — रामः पठति।

4. (ग) — कर्मणि द्वितीया — सः ग्रन्थं पठति।

5. (ख) — साधन में तृतीया — सः लेखन्या लिखति।

6. (ग) — जिसे कुछ दिया जाए — विप्राय धनं ददाति।

7. (घ) — अलग होने का भाव — वृक्षात् पत्रं पतति।

8. (ख) — रामस्य पुस्तकम्।

9. (ग) — आधार — जले मत्स्याः।

10. (घ) — साधन बताने वाला चिह्न।

11. (ख) — जिसके लिए काम हो।

12. (घ) — अलग होने का भाव।

13. (ग) — आधार या स्थान।

14. (ग) — कर्ता — प्रथमा।

15. (घ) — जाने का कर्म — द्वितीया।

16. (क) — लिखने का साधन — तृतीया।

17. (क) — अलग होना — पञ्चमी।

18. (ख) — आधार — सप्तमी।

19. (ख) — संबंध — षष्ठी।

20. (घ) — जिसे दिया — संप्रदान, चतुर्थी।

21. (क) — सहयुक्तेऽप्रधाने — रामेण सह।

22. (ख) — गणेशाय नमः।

23. (घ) — ग्रामं परितः।

24. (ख) — नदीम् उभयतः।

25. (ख) — गृहं प्रति।

26. (घ) — प्रजाभ्यः स्वस्ति।

27. (क) — ग्रामात् बहिः।

28. (क) — भीत्रार्थानां भयहेतुः — सिंहात् बिभेति।

29. (घ) — रुच्यर्थानां प्रीयमाणः — मह्यं मोदकं रोचते।

30. (ख) — पिता पुत्राय क्रुध्यति।

31. (घ) — ज्ञानं / ज्ञानेन / ज्ञानात् विना।

32. (क) — अलं विवादेन।

33. (ग) — ‘सह’ के समान अर्थ — तृतीया।

34. (ग) — वृक्षस्य अधः।

35. (ग) — वृक्षस्य उपरि।

36. (ग) — गृहस्य पुरतः।

37. (क) — हे राम! — प्रथमा का संबोधन रूप।

38. (घ) — आधारोऽधिकरणम्।

39. (क) — स्पृहेरीप्सितः — पुष्पेभ्यः स्पृहयति।

40. (क) — ग्रामम् अभितः।

स्तर 2: मध्यम (कक्षा 9–10, बोर्ड परीक्षा)

1. (क) — सहयुक्तेऽप्रधाने — तृतीया।

2. (ग) — परितः योगे द्वितीया।

3. (ग) — नमः योगे चतुर्थी।

4. (ग) — भीत्रार्थानां भयहेतुः।

5. (क) — रुच्यर्थानां प्रीयमाणः।

6. (घ) — येनाङ्गविकारः — अङ्ग-दोष में तृतीया।

7. (क) — बहिः योगे पञ्चमी।

8. (ख) — उपरि योगे षष्ठी।

9. (क) — क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः।

10. (क) — निषेधार्थे अलम् योगे तृतीया।

11. (घ) — विना योगे द्वितीया (तृतीया, पञ्चमी अपि)।

12. (घ) — भुवः प्रभवः — उद्गम-स्थान में पञ्चमी।

13. (ख) — आख्यातोपयोगे — विद्या ग्रहण में पञ्चमी।

14. (घ) — विषय रूप आधार में सप्तमी।

15. (घ) — यतश्च निर्धारणम् — निर्धारण में षष्ठी या सप्तमी।

16. (घ) — प्रति योगे द्वितीया।

17. (घ) — स्वस्ति योगे चतुर्थी (पञ्चमी बहुवचन भी ‘प्रजाभ्यः’ होता है, पर यहाँ अर्थ चतुर्थी का है)।

18. (क) — रुच् योगे प्रीयमाणे चतुर्थी।

19. (क) — उभयतः योगे द्वितीया।

20. (ग) — सह योगे तृतीया — पित्रा।

21. (क) — नमः योगे चतुर्थी।

22. (ख) — भयहेतु में पञ्चमी।

23. (ग) — परितः योगे द्वितीया।

24. (ख) — उपरि योगे षष्ठी।

25. (घ) — विना योगे द्वितीया (त्वया, त्वत् अपि शुद्धे)।

26. (ख) — रुच् योगे चतुर्थी।

27. (ख) — येनाङ्गविकारः — तृतीया।

28. (क) — बहिः योगे पञ्चमी।

29. (ख) — क्रुध् योगे चतुर्थी।

30. (ख) — अलम् (निषेध) योगे तृतीया।

31. (ग) — स्वस्ति योगे चतुर्थी।

32. (ग) — अधः योगे षष्ठी — सेतोः।

33. (ख) — सम्प्रदान — चतुर्थी।

34. (घ) — भुवः प्रभवः — पञ्चमी।

35. (ग) — अभितः योगे द्वितीया।

36. (क) — सह योगे तृतीया — सखी शब्दस्य तृतीयैकवचनम् ‘सख्या’।

37. (ग) — सहयुक्तेऽप्रधाने।

38. (घ) — नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च।

39. (ख) — भीत्रार्थानां भयहेतुः।

40. (ख) — उपरि, अधः, पुरतः आदि के योग में षष्ठी।

स्तर 3: कठिन (कक्षा 11–12, प्रतियोगी परीक्षाएँ)

1. (क) — कर्ता जिसे सबसे अधिक चाहे — कर्म।

2. (घ) — सबसे बड़ा साधन — करण।

3. (ख) — अलग होने में स्थिर रहने वाला — अपादान।

4. (ग) — आधार — अधिकरण।

5. (ग) — दान के कर्म से जिसे संतुष्ट करना हो — सम्प्रदान।

6. (ख) — क्रिया में स्वतंत्र — कर्ता।

7. (ग) — सह के योग में अप्रधान में तृतीया।

8. (घ) — नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम्, वषट् के योग में चतुर्थी।

9. (क) — भयहेतु की अपादान संज्ञा, अतः पञ्चमी।

10. (ग) — प्रसन्न होने वाले की सम्प्रदान संज्ञा, अतः चतुर्थी।

11. (घ) — जिस अंग से विकार दिखे, उसमें तृतीया — अक्ष्णा काणः।

12. (ख) — इन अव्ययों के योग में द्वितीया।

13. (ग) — जिस पर क्रोध हो, उसकी सम्प्रदान संज्ञा।

14. (ख) — नियमपूर्वक विद्या देने वाले की अपादान संज्ञा।

15. (क) — उद्गम स्थान की अपादान संज्ञा।

16. (ग) — शेष (सम्बन्ध) में षष्ठी।

17. (क) — समूह में से एक को अलग करने में षष्ठी या सप्तमी।

18. (ख) — दुह्, याच्, पच् आदि के गौण कर्म में भी द्वितीया।

19. (घ) — अकथितं च — गौण कर्म, अतः द्वितीया (पञ्चमी नहीं)।

20. (घ) — अधिशीङ्स्थासां कर्म — आधार की कर्म संज्ञा।

21. (ख) — अधिशीङ्स्थासां कर्म।

22. (घ) — उपान्वध्याङ्वसः — आधार की कर्म संज्ञा।

23. (घ) — प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् — तृतीया।

24. (ग) — हेतौ — कारण में तृतीया।

25. (घ) — तादर्थ्ये चतुर्थी — प्रयोजन में।

26. (घ) — स्पृहेरीप्सितः — सम्प्रदान।

27. (ख) — धारेरुत्तमर्णः — ऋण देने वाले की सम्प्रदान संज्ञा।

28. (क) — जुगुप्साविरामप्रमादार्थानामुपसंख्यानम्।

29. (क) — वारणार्थानामीप्सितः — अपादान।

30. (ख) — अन्तर्धौ येनादर्शनमिच्छति — अपादान (मातुः = पञ्चमी एकवचन)।

31. (ग) — जनिकर्तुः प्रकृतिः — उत्पत्ति के कारण की अपादान संज्ञा।

32. (ख) — यस्य च भावेन भावलक्षणम् — भावे सप्तमी।

33. (ख) — साध्वसाधुप्रयोगे च — सप्तमी।

34. (क) — पञ्चमी विभक्ते — तुलना में पञ्चमी।

35. (घ) — ‘उपरि’ के योग में षष्ठी होती है।

36. (ख) — ‘बहिः’ के योग में पञ्चमी होती है।

37. (क) — R ही A का कारण है।

38. (घ) — R सत्य है, इसलिए शुद्ध वाक्य ‘व्याघ्रात् बिभेति’ होगा; A असत्य।

39. (ग) — A सत्य; पर प्रीयमाण में चतुर्थी होती है — R असत्य।

40. (क) — यतश्च निर्धारणम्।

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